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कोरोना वायरस: रहस्यमय है चीन की भूमिका

चीन, जिसने कोरोना वायरस (कोविड-19) के ज़रिये लगभग पूरी दुनिया को आईसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) में भेज दिया; अब वही इसको अवसर के रूप में भुनाने लगा है। चीन अब पूरी दुनिया में वेंटिलेटर, फेस मास्क और अन्य उपकरण बनाकर सप्लाई कर रहा है। इस तरह कोरोना वायरस को लेकर चीन पर सवाल उठने लाजिमी हैं?

क्या कोरोना वायरस दुनिया भर में खौफ पैदा करने के लिए तैयार किया गया है? क्योंकि चीन के हुबेई प्रान्त के अलावा अधिकांश हिस्सों में जीवन लगभग सामान्य है। दुकानें, रेस्तरां, होटल, बार, बाज़ार, कार्यालय और व्यापार केंद्र खुल चुके हैं। विनिर्माण की सभी गतिविधियाँ चल रही हैं। फैक्ट्रियों पर उत्पादन जारी है। इससे स्वाभाविक रूप से एक सवाल उठता है कि चीन के वुहान से वायरस कैसे फैलता है? और उसके बाद इस पर वह तेज़ी से नियंत्रण भी पा लेता है।

सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियों से सहमत हुआ जा सकता है, जिनसे पता चलता है कि चीन ने दुनिया को पहले आईसीयू में डाल दिया और अब वह उनको वेंटिलेटर और मास्क की आपूर्ति कर रहा है। चीन के प्रमुख शहरों के हाईवे पर यातायात सुचारू रूप से गति पकड़ चुका है। अर्थ-व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए चीन के ज़्यादातर कर्मचारी अपने काम पर लौट आये हैं। बाकी दुनिया अब भी कोरोना वायरस से जूझ रही है और भारत जैसे देशों में प्रवासी मज़दूर अपने गाँवों में लौट चुके हैं या लौटने को मजबूर हैं। इससे एक बार को तो भारी भीड़ की स्थिति पैदा हो गयी थी और मज़दूरों तथा अन्य लोगों का जीवन भी खतरे में है। चीन ने वही किया, जैसा कि माना जा रहा था। उसने अपने यहाँ पर सभी तरह के प्रतिबन्ध हटा दिये हैं और वहाँ का जन-जीवन पहले की तरह सामान्य हो चुका है। यही नहीं, उसने कुछ ही हफ्तों में अपने यहाँ की अधिकांश व्यावसायिक गतिविधियाँ भी फिर से शुरू कर दी हैं। ऐसे समय में जब पूरा यूरोप समेत अनेक प्रमुख देश कोरोना वायरस की जाँच के लिए संघर्ष कर रहे हैं, चीन इससे भी लाभ कमाने की एक शुरुआत कर चुका है।

बीएमडब्ल्यू ने चीन में फिर शुरू किया काम

चीन में विदेशी कम्पनियाँ भी वापस आने लगी हैं। यहाँ पर बीएमडब्ल्यू ने एक बार फिर से उत्पादन शुरू कर दिया है। पूर्वोत्तर चीनी शहर शेनयांग में बीएमडब्ल्यू ब्रिलिएंस फैक्ट्रीज के करीब 20,000 कर्मचारी काम पर लौट आये हैं। संयुक्त उद्यम का कहना है कि कम्पनी जल्द ही सामान्य उत्पादन क्षमता को फिर से शुरू करने लगेगी। शेनयांग के पास बीएमडब्ल्यू ग्रुप का सबसे बड़ा विदेशी उत्पादन का केंद्र है। बीएमडब्ल्यू ब्रिलिएंस के सीईओ डॉ. जोहान वीलैंड ने शेनयांग नगर पालिका का धन्यवाद व्यक्त करने के लिए एक पत्र लिखा है। उनका मानना था कि कम्पनी बाज़ार में बदलावों के लिए जल्दी से प्रतिक्रिया दे सकती है और उत्पादन पर कोरोना वायरस के प्रकोप के पडऩे वाले असर को कम कर सकती है। भविष्य में कम्पनी वास्तविक स्थिति के आधार पर योजनाओं को आगे बढ़ायेगी, जो उत्पादन प्रणाली की ज़रूरत के अनुकूल होगा। कम्पनी को सभी तरह के समर्थन के लिए डॉ. वीलैंड ने शेनयांग नगर पालिका का आभार भी जताया। डॉ. वीलैंड ने भरोसा जताया कि वाॢजक उत्पादन, बिक्री लक्ष्य और प्रमुख परियोजनाओं के निर्माण को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया जाएगा।

शेयर 417 फीसदी चढ़े

कोरोना वायरस के प्रकोप से डॉन पॉलीमर के शेयर की कीमत में 417 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। जनवरी में कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद से कोरोना किट के तौर पर ज़रूरी ड्रेस के अलावा सॢजकल मास्क में इस्तेमाल की जाने वाली अनोखी सामग्री तो यू जियाओनिंग के लिए रुपये छापने जैसा है। वैश्विक महामारी, जो चीन से यूरोप और अमेरिका तक फैल चुकी है; के चलते मास्क की पूरी दुनिया में कमी हो चुकी है, जिसके चलते सॢजकल मास्क माँग बेहद ज़्यादा है और चीन इसकी बड़ी मात्रा में सप्लाई कर रहा है। जहाँ-जहाँ भी कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है, वहाँ की सरकारें स्वास्थ्य कर्मचारियों की रक्षा करना चाहती हैं और इस बीमारी के छूने मात्र से फैलने के चलते इससे बचाव के उपाय करना भी अनिवार्य है। इसलिए पूरी दुनिया में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) की माँग में बेहद तेज़ी से इज़ाफा हुआ है। चीन में मास्क में इस्तेमाल किये जाने वाले विशेष वस्त्रों के लिए अनुमानित बाज़ार हिस्सेदारी में 40 फीसदी शेयर के साथ शेन्झेन में सूचीबद्ध डॉन पॉलीमर के शेयरों में 20 जनवरी से 417 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी। अपुष्ट खबरें ये भी हैं कि चीन कई विदेशी कम्पनियों को खरीदने की प्रक्रिया में है, जो वित्तीय आपदा का सामना कर रही हैं।

ट्रंप का ट्वीट : चीनी वायरस

नेचुरल कोरोलरी है- क्या चीन इसे इस तरह रख सकता है? चारों ओर अलग-अलग तरह की साज़िशों की भी चर्चा चल रही है, जिसमें कहा जा रहा है कि चीन ने इस वायरस को जैविक युद्ध के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रयोगशाला में विकसित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कोरोना वायरस का ज़िक्र कर ट्वीट करके कोविड-19 बीमारी को चीनी वायरस करार दिया था। अमेरिकी प्रशासन के कई अधिकारियों ने भी इसे चीनी वायरस बताया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कोरोना वायरस के खतरे को भाँपते हुए पहले ही लोगों को किसी संक्रमित विशेष क्षेत्र या समूह में न जुटने के लिए कह चुका है। हालाँकि, पोम्पियो ने बार-बार वुहान वायरस कहकर इसका उल्लेख किया है। चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा कि यह ट्वीट चीन के कलंक हैं। चीन की आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहा कि ट्रंप की भाषा नस्लवादी और जेनोफोबिक थी और कोरोना वायरस पर बढ़ते खतरों को लेकर राजनेताओं ने गैर-ज़िम्मेदारी और अक्षमता का परिचय दिया है।

सवाल यह है कि चीन ने अचानक किसी चमत्कार की तरह इस महामारी पर एक साथ किस तरह से काबू पा लिया? 18 मार्च को चीन ने पहली बार कोरोना वायरस का कोई भी नया मामला नहीं आने की जानकारी दुनिया को दी। इसके बाद से चुनिंदा केस ही सामने आये, वह भी वुहान के इलाके से ही। हालाँकि वुहान, जहाँ कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत हुई; वह इलाका बाकी हिस्सों से पिछड़ रहा है। क्योंकि लॉकडाउन के बाद वहाँ पर लम्बे समय बन्द रहा। लेकिन अब उसको भी धीरे-धीरे खोल दिया गया है।

मान लेते हैं कि इस महामारी का वायरस फैलने के पीछे कोई साज़िश नहीं हो और केवल तथ्यों पर बातचीत की जाए, तो पहला तथ्य यह है कि जब दुनिया के अधिकांश लोग पीडि़त थे और कोरोना वायरस दुनिया भर के दूरदराज़ इलाकों में पहुँच चुका था, तब चीन के अधिकांश शहर इससे अछूते थे। क्यों? यह कैसे सम्भव हुआ और हो सकता है? क्या चीन के पास पहले से इस वायरस से निपटने की दवा थी? अगर ऐसा था, तो क्या चीन जानता था कि यह वायरस फैलने वाला है? दूसरा, चीन ने अभी तक दुनिया को इस खतरनाक वायरस के निपटने का असली नुस्खा नहीं बताया है। आिखर क्यों? क्या चीन चाहता है कि दुनिया में यह तबाही फैली रहे और वह इसकी आड़ में अपना व्यापार करता रहे?

शंघाई, बीजिंग कैसे रहे अछूते?

शंघाई की आबादी करीब 2.5 करोड़ है और यहाँ पर सिर्फ 468 मामले सामने आये। इतनी ही नहीं यहाँ इस वायरस से सिर्फ 5 मौतें ही हुईं। बीजिंग की आबादी 2.15 करोड़ है, लेकिन कोरोना वायरस के यहाँ केवल 500 मामले आये और सिर्फ 8 मौतें हुईं। ये दो शहर दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से हैं। ऐसे में इन दोनों शहरों में चुनिंदा मामले सामने आने से कुछ संदेह तो पैदा होना स्वाभाविक है कि आिखर चीन के वित्तीय केंद्र इस खतरनाक वायरस से कैसे अछूते रह गये?

दुनिया भर के स्वास्थ्य से जुड़े विषेशज्ञ मामले को बारीकी से देख रहे हैं। हॉन्ग कॉन्ग यूनिवॢसटी (एचकेयू) के महामारी विज्ञान के कीजी फुकुदा के हवाले से साइंस जर्नल के लिए डेनिस नॉॢमले ने लिखा- ‘चीन ने पूरी दुनिया को एक मुद्दे पर घेरकर रख दिया है कि आिखरकार एक ही समय में सामाजिक गतिविधियों को कैसे सामान्य और बहाल किया जाए?  इसके साथ ही सभी यही सोच रहे हैं कि इस महामारी के प्रकोप से होने वाले खतरे को कैसे कम किया जाए?’

चीन की बात करें, तो अब वहाँ पर जो भी इसके संक्रमण के नये मामले आ रहे हैं, वे बाहर से आने वाले चीन के लोग हैं। 18 मार्च के बाद से वहाँ जाने वाले हवाई यात्रियों में 500 से अधिक मामलों की पुष्टि की गयी है। अब चीन की सरकार ने चीन में लगभग सभी विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इसके साथ ही ऐसे सभी चीन ने अपने लोगों को दो हफ्ते के लिए अलग रहने (क्वारंटाइन में) रखने की पहल की है, जो बाहर से वहाँ पहुँच रहे हैं। चाहे वे हवाई मार्ग से आ रहे हों या अन्य किसी मार्ग से।

चीन ने अब अपने पर्यटन स्थलों को भी खोल दिया है। लेकिन कोरोना वायरस के वापस आने के भय से वहाँ फिलहाल विदेशियों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। कहा जा सकता है कि जिस तरह से चीन में बदलाव आ रहा है, उससे लगता है कि कुछ ही हफ्तों में चीन में जन-जीवन फिर से सामान्य हो जाएगा। लेकिन वहाँ फेस मास्क सर्वव्यापी है। सार्वजनिक स्थलों पर लोग इसे पहनते हैं, साथ ही सोशल डिस्टेंस को भी अपना रहे हैं। इसके अलावा लाखों लोग अब भी घर से ही काम करना जारी रखे हुए हैं। हालाँकि, रिपोर्टों से पता चलता है कि चीन की विनिर्माण क्षेत्र की लगभग 10,000 इकाइयों ने फिर से उत्पादन शुरू कर दिया है।

कोरोना वायरस से बचने के लिए जाँचकर्ता किसी भी नये संक्रमित मामले की पुष्टि के साथ ही उसे और उसके सम्पर्क में आने वालों को क्वारंटाइन में रख रहे हैं। इसके अलावा एहतियातन बीजिंग और अन्य प्रमुख शहरों में क्लीनिकों में पहुँचने वाले सभी मरीज़ों का अब वायरस के लिए परीक्षण किया जा रहा है। कई प्रान्त अपनी सीमा पार करने वाले प्रवासी श्रमिकों और अन्य लोगों के स्वास्थ्य की जाँच भी कर रहे हैं। सरकार की ओर से लगाये गये नये यात्रा प्रतिबन्धों पर भले ही आपत्ति जतायी गयी थी, जब अमेरिका ने जनवरी में चीन के आगंतुकों पर प्रतिबन्ध लगाया था। लेकिन अब समझ में आ रहा है कि यह बाकी दुनिया के लिए कितना जोखिम भरा था और इसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले भी लिया। चीन में उड़ानों पर भी भारी अंकुश लगाया गया है। इसके अलावा चीन अपने नागरिकों की सख्त स्क्रीनिंग करता है और वे इससे गुज़रते भी हैं। यही नहीं, चीन बाहर से वापस आने वाले अपने नागरिकों को दो हफ्ते के लिए क्वारंटाइन में रखता है।

अब आहिस्ता-आहिस्ता और व्यवस्थित तरीके से प्रतिबन्धों में ढिलाई बरती जा रही है। पहले कई रेस्तरां कुछ घंटों के लिए और सीमित ग्राहकों के लिए ही खोले गये थे; अब सभी के लिए उन्हें खोला जा रहा है। कई प्रान्तों में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल फिर से खुल गये हैं, लेकिन केवल इस बीमारी से मुक्त स्थानों पर। फिर भी यहाँ स्कूलों को छात्रों की स्क्रीनिंग भी की जा रही है, तब उन्हें कक्षा (क्लास) में प्रवेश दिया जा रहा है। इसके अलावा विश्वविद्यालयों; जहाँ देश भर के छात्र होते हैं; की पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑनलाइन ही कक्षाएँ ली जा रही हैं। भीड़ जुटाने वाले कार्यक्रमों पर फिलहाल प्रतिबन्ध बरकरार रखा गया है। कई शहरों में लाइव म्यूजिक वेन्यू और जिम बन्द हैं। मेट्रो के प्रवेश द्वार और फैक्ट्री में एंट्री करने वालों की थर्मल स्क्रीनिंग यानी तापमान की जाँच की जाती है।

ड्यूक कुन्शान विश्वविद्यालय के महामारी विज्ञानी बेंजामिन एंडरसन कहते हैं- ‘कुल मिलाकर चीन की रणनीति फिर से स्थिति को सामान्य करने में प्रभावी रही है। चीन के लिए बहुत कुछ दाँव पर है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि चीन के सकल घरेलू उत्पाद में इस वर्ष की पहली तिमाही में 10 फीसदी की कमी हो सकती है, जो 1976 के बाद से सबसे खराब होगी। यूरोप और अमेरिका के खुद इस महामारी से जूझने के साथ ही चीन में बने सामान की माँग बढ़ गयी है। मास्क और चिकित्सा उपकरणों की चीन अलग से आपूर्ति कर रहा है।’

चीन में रातोंरात बन गये कारखाने

चीन की सीडीसी के निदेशक जॉर्ज गाओ कहते हैं कि उनकी रणनीति यह है कि जब तक कोई वैक्सीन या दवा उपलब्ध नहीं होती, तब तक यह समय बिताना होगा। इसके लिए अब वेंटिलेटर, फेस मास्क और अन्य उपकरणों का निर्माण चीन ने शुरू कर दिया है; जिनका उपयोग कोरोना वायरस को फैलने से रोकने और जाँच व इलाज में मेडिकल स्टाफ द्वारा किया जाता है। बीजिंग की एक एएफपी रिपोर्ट ने यह भी पुष्टि की है कि कोरोना वायरस की महामारी जो चीन के एक शहर से पैदा हुई और अब इसने वैश्विक रूप ले लिया है। चीन में हज़ारों कारखाने ऐसी चीज़ों के निर्माण के लिए खोल दिये हैं, जिनका निर्यात करके उसने इस अवसर को अपने मुनाफे के तौर पर भुनाना भी शुरू कर दिया है। फरवरी की शुरुआत में चीन में प्रकोप चरम पर था। इसी दौरान चीन की सरकार ने गुआन जुन्ज में महज़ 11 दिनों में एक नयी मास्क फैक्ट्री बना दी।

उत्तर-पूर्वी चीन में पाँच उत्पादन क्षेत्रों के साथ फैक्ट्री से एन-95 फेस मास्क बनाये, जो बेहद ज़रूरी थे और संक्रमण के मामले बढऩे के साथ ही इनकी माँग तेज़ी से बढ़ी। जैसा कि चीन में अब मामलों में कमी आयी है। 34 वर्ष से जो पहले फार्मास्यूटिकल्स में था; अब नये बाज़ार में मुनाफा कमा रहा है। मास्क व अन्य चिकित्सा उपकरणों की सप्लाई इटली के साथ ही अन्य देशों को भी जा रही है। बता दें कि कोरोना का कहर चीन के बाद सबसे ज़्यादा इटली में ही हुआ और अब तक पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा मरने वालों का आँकड़ा इटली का ही है।

साल के शुरुआती दो महीनों में 8,950 नये निर्माताओं ने चीन में मास्क का उत्पादन शुरू कर दिया। व्यापार डेटा मंच तियान्यांचा के अनुसार, माँग में भारी अन्तर को भरने के लिए प्रतिस्पद्र्धा शुरू हो गयी। लेकिन हुबेई प्रान्त के वायरस हॉट स्पॉट को लॉकडाउन पर रखे जाने के बाद और चीन में शुरुआत में लोगों की मौत की खबरें भी आयीं। बाद में दुनिया के अन्य देशों में फैलने के साथ ही नये गर्म स्थानों में वायरस का प्रकोप शुरू हो गया। वैश्विक रूप से करीब 15 लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं। इसके साथ ही पूरी दुनिया में करीब एक लाख लोग मौत के काल में शिकार हो चुके हैं। इससे सुरक्षात्मक उपकरणों की माँग अब तेज़ी से बढ़ रही है, क्योंकि दुनिया भर के 200 से अधिक देशों में इसका प्रकोप जारी है।

दक्षिण-पूर्वी ग्वांगडोंग प्रान्त के डोंगगुआन शहर में एक एन-95 मास्क बनाने वाली कम्पनी की सेल्स मैनेजर शी जिंगहुई ने कहा- मास्क बनाना वर्तमान में नोट छापने जैसा है। पूर्व की तुलना में अब एक मास्क का मुनाफा कई सेंट तक पहुँच चुका है। एक दिन में 60,000 या 70,000 मास्क तैयार करने का मतलब, बिल्कुल वैसे ही जैसे नोट छापे जा रहे हों।’

क्यूई गुआंगटू ने अपने औद्योगिक क्षेत्र डोंगगुआन के मास्क बनाने वाली मशीनों के निर्माण में 50 मिलियन से अधिक युआन (10 मिलियन डॉलर) का निवेश किया। वुहान में लॉकडाउन के महज़ दो दिन बाद ही 25 जनवरी से यहाँ पर 24 घंटे निरन्तर उत्पादन जारी है; जबकि यह वायरस पहली बार सामने आया है। लागत वसूली निश्चित रूप से कोई समस्या नहीं है। उन्होंने कहा कि 70 सेट उपकरण 5,00,000 से अधिक युआन में बेचे गये हैं। उनके हाथ में 200 से अधिक सेट अतिरिक्त ऑर्डर हैं, जिनकी कीमत 100 मिलियन युआन से अधिक है। कह सकते हैं कि मशीनें 15 दिनों में अपने कर्मचारियों का भुगतान करती हैं। क्यूई ने कहा कि उनके ग्राहकों के लिए निवेश का यह पैसा वसूल विकल्प है।

निर्माता यू लिक्सिन ने बताया कि उसने पहले कभी मास्क बनाने की कम्पनी में हाथ नहीं आजमाया था। लेकिन जब बाज़ार में तेज़ी आयी और उन्होंने मौका देखा, तो उन्हें पहली बार उद्योग में प्रवेश करने से लेकर मास्क बनाने में सक्षम स्वचालित मशीनों की आपूर्ति करने में महज़ 10 दिन का समय लगा। उन्होंने बताया कि अब मैं रोज़ाना दो या तीन घंटे सोता हूँ और बाकी समय अपने ग्राहकों के लिए दे रहा हूँ।

गुआन के मुताबिक, उनके ग्राहक भी अपने संयन्त्र में सो जाते थे। वे भी अपनी नयी मशीनरी को जुटाने के लिए बेताब थे। उनमें से कुछ वानजाउ, पूर्वी झेजियांग प्रान्त में कपड़ा कारखानों के मालिक हैं, जिन्होंने फेस मास्क का उत्पादन करना शुरू किया था। वे ऐसी माँग का सामना कर रहे थे, जिनमें उनकी सप्लाई करने की क्षमता थी ही नहीं। यानी इतनी ज़्यादा माँग बढ़ी, कि उसकी डिलीवरी कर ही नहीं सकते थे। वायरस संकट के तेज़ी से उभार होने चलते लोगों में घबराहट भी बढ़ गयी। मास्क उत्पादन में तेज़ी से उछाल आने के बाद इसके कच्चे माल की कीमतों में भी भारी उछाल देखा गया।

गुआन के अनुसार, इस दौरान फैब्रिक की कीमतें अचानक आसमान छूने लगीं। उन्होंने बताया कि इनकी कीमत 10,000 युआन से बढक़र 4,80,000 युआन प्रति टन हो गयी। निर्माता लियाओ बियाओ ने जनवरी के अन्त में हुनान प्रान्त के बाहर से मास्क मशीन के कलपुर्जे लाने के लिए जद्दोज़हद की थी। क्योंकि उससे सटी सीमा को बन्द कर दिया गया था। अन्त में मास्क बनाने वाली मशीनों के लिए एक विशेषज्ञ परीक्षक प्राप्त करने के लिए लियाओ ने सामान्य मूल्य से 10 गुना अधिक का भुगतान किया। अब इसमें अंधाधुन्ध निवेश किया जा रहा है।

लेकिन उत्पादन के लिए बढ़ती लागत के बावजूद यह उद्योग मुनाफा कमाने के लिए आकर्षक बना हुआ है। चीन के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, उसकी रोज़ाना मास्क उत्पादन 116 मिलियन से अधिक हो गयी है, जिसमें बहुत से देशों की माँगें भी शामिल हैं।

गुआन पहले ही एक मिलियन मास्क इटली पहुँचा चुके हैं। जबकि शी के पास वर्तमान में दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ के देशों के 200 सेंट से अधिक के ऑर्डर्स हैं। शी ने कहा कि डोंगगुआन अब भी दुनिया का कारखाना है। इसकी माँग पहली बार फरवरी के मध्य में बेहद तेज़ी से बढ़ी थी।

अब महामारी के कारण दूसरी लहर है। लियाओ अपने मास्क यूरोप और कनाडा में निर्यात करना भी चाह रहा है। मास्क की माँग हमारे देश में कम हो गयी है। अब हम अन्य देशों को समर्थन देने के लिए कुछ अतिरिक्त मास्कों की आपूर्ति कर सकते है। उन्होंने बताया कि हम दूसरों की मदद करने को तैयार हैं। गुआन प्रकोप से परे उद्योग के भविष्य के बारे में आशावादी हैं। उनका मानना है कि ज़्यादातर लोगों को इस प्रकोप के बाद मास्क पहनने की आदत हो जाएगी।

 किताब से लगा खौफ का अंदाज़ा

चीन पर शक की सुई क्यों घूम रही है? इसके पीछे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के दो कर्नलों- किआओ लियांग और वांग जियांगसुई द्वारा लिखित पुस्तक अनरीस्ट्रिक्टेड वारफेयर है। इसमें मुख्य रूप से यह चिन्ता ज़ाहिर की गयी है कि चीन तकनीकी रूप से विभिन्न तरीके से प्रतिद्वंद्वी को कैसे हरा सकता है? प्रत्यक्ष सैन्य टकराव पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय यह पुस्तक कई अन्य साधनों की तलाश करती है। पुस्तक को तब अंग्रेजी में एक पनामा के प्रकाशक ने अमेरिका को नष्ट करने के लिए चीन का मास्टर प्लान कवर के साथ जलते हुए वल्र्ड ट्रेड सेंटर की जलती तस्वीर के साथ छापा था। पुस्तक पश्चिम के खिलाफ डर्टी वार का खाका नहीं था, बल्कि भविष्य के युद्ध पर नयी सोच का आह्वान किया गया था।

फरवरी में तहलका ने क्या कोरोना वायरस चीनी जैविक युद्ध का हिस्सा है? शीर्षक से खबर प्रकाशित करके इस ओर इशारा किया था। इस खबर को तहलका ने जियोपॉलिटिकल और इंटरनेशनल रिलेशंस पर लिखे टायलर डरडेन के लेख के आधार पर प्रकाशित किया था। इसे ग्रेट गेम इंडिया ने प्रकाशित किया था, जिसमें कहा गया है कि चीन ने इसे हथियार बनाने के लिए कनाडा से कोरोना वायरस चुराया था? द ग्रेट गेम इंडिया ने दावा किया कि उसकी जाँच ने एजेंटों को चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम से जोड़ा है, जहाँ से वुहान कोरोना वायरस के फैलने का संदेह है।

इसमें कहा गया है कि पिछले साल कनाडा से एक रहस्यमय शिपमेंट को कोरोना वायरस की तस्करी करते पकड़ा गया था। इससे एक कनाडाई लैब में काम करने वाले चीनी एजेंटों का पता लगाया गया था। इसकी कहानी कुछ इस तरह है- 13 जून, 2012 को सऊदी अरब के जेद्दा में एक 60 वर्षीय व्यक्ति को बुखार, खाँसी, एक्सफोलिएशन और साँस लेने में तकलीफ के साथ एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह शख्स धूम्रपान भी नहीं करता था। लम्बे समय से उसे दवाइयाँ नहीं मिल रही थीं। उसके पास काॢडयोपल्मोनरी या गुर्दे की बीमारी का कोई इतिहास नहीं था।

मिस्र के वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर अली मोहम्मद ज़की ने अपने फेफड़ों से एक अज्ञात कोरोना वायरस को अलग कर दिया। रुटीन डायग्नॉस्टिक्स के कारण एजेंट को पहचानने में नाकाम रहने के बाद ज़की ने सलाह के लिए नीदरलैंड के रॉटरडैम में इरास्मस मेडिकल सेंटर (ईएमसी) के एक प्रमुख वायरोलॉजिस्ट रॉन फुचियर से सम्पर्क किया। फाउचर ने ज़की द्वारा भेजे गये एक नमूने से वायरस का अनुक्रम किया। फ्यूचर ने एक व्यापक स्पेक्ट्रम (पैन-कोरोना वायरस) का इस्तेमाल किया, जो मनुष्यों को संक्रमित करने के लिए जाना जाता है। इसे कई ज्ञात कोरोनविर्यूज की विशिष्ट विशेषताओं के लिए परीक्षण करने के लिए वास्तविक समय पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) विधि का उपयोग कर किया जाता है।

कोरोना वायरस का नमूना कनाडा के नेशनल माइक्रोबायोलॉजी लैबोरेटरी (एनएमएल) के वैज्ञानिक निदेशक डॉक्टर फ्रैंक प्लमर ने विन्निपेग में फाउचर से प्राप्त किया था, जिनको यह ज़की से मिला था। द ग्रेट गेम इंडिया का आरोप है कि चीनी एजेंटों ने कथित तौर पर कनाडाई लैब से इस वायरस को चुराया था। इसमें बताया गया है कि 4 मई, 2013 को डच लैब से कोरोना वायरस कनाडा की एनएमएल विनीपेग सुविधा में पहुँचा। कनाडाई लैब ने इस वायरस के स्टॉक को बढ़ाया और इसका उपयोग कनाडा में होने वाले डायग्नॉस्टि टेस्ट के आकलन में किया। विन्निपेग के वैज्ञानिकों ने यह देखने के लिए काम किया कि किस पशु की प्रजाति नये वायरस से संक्रमित हो सकती है।

फिर से कोरोना लहर का खौफ

हालाँकि, चीन ने आॢथक गतिविधि शुरू कर दी है, लेकिन वैज्ञानिकों को डर है कि चीन के लॉकडाउन में आसानी के साथ दूसरा कोरोना वायरस वायरस हो सकता है। कुछ महीनों में पहली बार चीन का हुबेई का प्रान्त, जहाँ कोरोना वायरस पहली बार कहर बना; अब वहाँ पर लोग उसे अच्छी वजह के लिए जानना पसन्द करना चाहेंगे। कोविड-19 के मामले भले ही कहने को यहाँ पर शून्य के स्तर पर आ गये हैं, जिसके चलते यहाँ पर बाहरी यात्रियों के लिए लगा प्रतिबन्ध हटा दिया गया है। इस इलाके को अचानक 60 दिनों के लिए पूरी तरह से बन्द कर दिया गया था। अब वैज्ञानिक और बाकी दुनिया यह करीब से देख रहे हैं कि फिर से नये मामले सामने न आयें, इसके लिए लोगों को अलग रखने के लिए उपाय अपनाना आसान हो गया है।

30 मार्च को नेचर रिसर्च जर्नल में डेविड साइरोन्स्की ने अपने शुरुआती विश्लेषण में पाया कि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह वायरस फिर से संक्रमित नहीं करेगा, क्योंकि इसकी आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यह लॉकडाउन के द्वारा राहत लेने का समय ज़रूर है, लेकिन हमें संक्रमण की सम्भावित अगले खतरे के लिए सतर्क रहने की ज़रूरत है। बेन काउलिंग कहते हैं- ‘हांगकांग विश्वविद्यालय में महामारी के विषेशज्ञ हैं, जो कि चीन की स्थिति पर नज़र बनाये हुए हैं।’ काउलिंग के मुताबिक, यदि दूसरी लहर आती है, तो ऐसा अप्रैल के अन्त तक हो सकता है।

हुबेई और पूरे चीन में अब आगे कैसे चीज़ें बदलती हैं? यह कई यूरोपीय देशों और कुछ अमेरिकी राज्यों के लिए बेहद प्रासंगिक होगा, जिन्होंने अपनी सीमाओं को बन्द कर दिया है। इतना ही नहीं, इन देशों और राज्यों में अधिकांश व्यवसाय, स्कूल और विश्वविद्यालय व धाॢमक स्थलों में पर ताला लगा दिया गया है और लोगों से कहा गया है कि घर पर ही रहें। घर से बाहर निकलने की कोशिश न करें, क्योंकि बाहर निकलने का मतलब है कि आप भी इसकी गिरफ्त में आ सकते हैं। ब्रिटेन में फैले प्रकोप का आकलन करने से पता चलता है कि स्कूल और विश्वविद्यालय बन्द किये जाने और देश के सामाजिक जमावड़े को अगले दो वर्षों तक रोकना होगा, ताकि बड़े पैमाने पर कोविड-19 संक्रमण पर नियंत्रण पाया जा सके साथ ही अस्पतालों में ज़रूरी प्रबन्ध की व्यवस्था की जा सके।

लेकिन अगर चीन ने यह दिखा दिया कि कोविड-19 के दोबारा होने की आशंका से पहले ही उसने लॉकडाउन को खत्म कर दिया है, तो हो सकता है कि आगे इस तरह की कई देशों में लगायी जा रही पाबन्दियाँ ज़रूरी नहीं लगेंगी। चीन अब नये संक्रमणों का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर परीक्षण करके सम्पर्क की ट्रैसिंग करेगा साथ ही सामाजिक दूरी का पालन भी किया जाएगा। चीन ने अपनी सीमाओं को भी सभी के लिए बन्द कर दिया है, लेकिन लोगों की आवाजाही से इसके आने की आशंका बरकरार है। क्योंकि वहाँ बाहर से वापस लौटने वाले नागरिकों को 14 दिन तक क्वारंटाइन पर रखा जा रहा है। कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि चीन में स्थिति भिन्न है। क्योंकि वहाँ की सरकार ने आक्रामक तरीके से काम किया है, ताकि सम्भावित ट्रांसमिशन स्रोतों पर रोक लगायी जा सके। संक्रमित लोगों के प्रसार और व्यापक परीक्षण और सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन किया गया। इस रणनीति ने देश को प्रकोप से बचाने में मदद की। लेकिन अन्य देशों, जैसे कि इटली और स्पेन ने मुख्य रूप से वायरस को धीमा करने पर ध्यान केंद्रित किया। इससे सामाजिक उपाय नहीं अपनाये गये, साथ ही बहुत शुरुआत में बहुत ज़्यादा जाँचें नहीं की गयीं और न ही लोगों को ट्रैस किया गया। काउलिंग कहते हैं कि वे महामारी के बाद अब फिर से पहले जैसे जीवन में लौटना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।

फिर भी चीन में नये तरह से प्रकोपों का खतरा अधिक है। क्योंकि वहाँ पर लोगों के बीच वायरस आसानी से आगे भी एक से दूसरे में पहुँच सकता है; हांगकांग यूनिवॢसटी के संक्रामक रोग से जुड़े शोधकर्ता गेब्रियल ल्यूंग कहते हैं कि अब कई इलाके ऐसे हैं जहाँ पर जाँच नहीं हो सकी है कि वहाँ पर संक्रमण है या नहीं। सम्भव है कि लॉकडाउन पर्याप्त न हो और वायरस को खत्म करने के लिए कहीं और ज़्यादा गम्भीर तरीके अपनाये जाने की आवश्यकता हो सकती है। तनाव के चलते सेहत पर असर, अर्थ-व्यवस्था को बचाये रखना और भावनात्मक लगाव हर सरकार के लिए आगे परेशानी का सबब होंगे।

प्रतिबन्ध लगाना आसान नहीं

हुबेई में करीब 6 करोड़ की आबादी है और यहाँ लोगों का सामान्य जीवन वापस आने में लम्बा समय लग सकता है। कहने को भले ही पाबन्दियाँ हटा दी गयी हों, पर अभी बहुत से एहतियात बरतने पड़ रहे हैं। लोग धीरे-धीरे काम पर लौट रहे हैं और अब स्कूल व कारखाने फिर से खुल रहे हैं। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय, स्कूल और बाल देखभाल केंद्र महामारी नियंत्रण की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन अभी किया जाना है। हुबेई की राजधानी वुहान में और बाहर सफर करने के लिए 8 अप्रैल तक प्रतिबन्ध लगा रखा है। इससे पहले लोगों को आने और जाने के लिए वायरस का परीक्षण करना भी अनिवार्य किया गया। 18 मार्च से हुबेई में केवल एक नया मामला सामने आया है।

यूके की एक टीम ने मॉडल बनाया है कि छ: चीनी प्रान्तों में सबसे ज़्यादा कोविड-19 के मामलों में यात्रा करने में बरती गयी ढिलाई के बाद नये संक्रमणों के मामले तेज़ी से बढ़े। इन प्रान्तों में हुबेई, बीजिंग, ग्वांगडोंग, हेनान, हुनान और झेजियांग शामिल हैं। लॉकडाउन से नये कोविड-19 मामलों का पूरी तरह से खात्मा करने में मदद मिली।

इंपीरियल कॉलेज लन्दन में संक्रामक रोग शोधकर्ताओं नील फग्र्यूसन और स्टीवन रिले की टीम ने पाया कि फरवरी के अन्त में इन क्षेत्रों में आवाजाही और आॢथक गतिविधि को देखा जाए, तो हुबेई को छोडक़र सभी प्रान्तों में इज़ाफा दर्ज किया गया। नये संक्रमणों की संख्या शून्य के करीब पहुँच गयी। मार्च में हुबेई में गतिविधि फिर से शुरू होने के कारण, नये मामलों की संख्या एकदम कम हो गयी। विश्लेषण का निष्कर्ष यह रहा कि लॉकडाउन की सख्ती के साथ वायरस का सामना करने के बाद भी चीन ने कुछ हद तक अपनी कठोर सामाजिक-दूरी की रणनीति को सफलतापूर्वक अपनाकर इससे निपटने में सफलता पा ली।

यूनिवॢसटी ऑफ साउथैम्पटन, ब्रिटेन के एंड्रयू टेटम जो नयी तरह की बीमारियों के बीमारियों के शोधकर्ता हैं, उनका कहना है कि जितनी दूरी, उतना ही अच्छा है। लेकिन इसके निष्कर्षों तक पहुँचने से पहले कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए। छ: प्रान्तों में आवाजाही और आॢथक गतिविधि का स्तर, जिसे समूह ने परखा था; उनमें से केवल आधे ही प्रकोप से पहले वाली स्थिति में आये; सिवाय झेजियांग प्रान्त को छोडक़र। यहाँ पर ही महामारी से पहले वाली स्थिति प्रतीत हो रही है। गतिविधियों में इज़ाफा और नये मामलों सामने आने की रिपोर्ट में एक अंतराल भी हो सकता है। हम फिलहाल देखने और इंतज़ार करने वाली स्थिति में है। वे कहते हैं कि आगे की गतिविधियों का ग्राफ कैसा होगा, जो सामान्य होने की ओर हो सकता है? उसे देखना दिलचस्प होगा।

दूसरी लहर

लेउंग कहते हैं कि वायरस को समुदाय में दोबारा से फैलने में दिक्कत होगी। क्योंकि अगर 50 से 70 फीसदी लोग अगर इसके संक्रमित हो चुके होंगे, तो वे अब इस रोग से लडऩे में सक्षम होंगे। पर उन्होंने कहा कि वुहान में भी, जो चीन के 81,000 से अधिक मामलों के ज़िम्मेदार है; उन लोगों की संख्या-जो संक्रमित हैं और अब जो रोग से लडऩे में बचे होंगे, जिनकी प्रतिरोधक क्षमता नहीं होगी-वह  शायद 10 फीसदी से कम है। इसका मतलब यह है कि बहुत सारे लोग अब भी संक्रमण की चपेट में हैं। वैक्सीन से इम्यून लोगों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन अभी कम-से-कम एक साल तक किसी टीके के ईज़ाद होने की उम्मीद नहीं है। वे कहते हैं कि इतनी बड़ी तादाद राहत लेने वाली नहीं है।

टेटम कहते हैं कि इन उपायों को आसान बनाने के अपने जोखिम हैं; जिसके लिए आपको केवल हॉन्गकॉन्ग में देखना होगा कि वहाँ पर क्या होता है? हॉन्गकॉन्ग के साथ ही सिंगापुर और ताईवान में भी कोरोना वायरस के शुरुआती प्रसार के बारे में देखना होगा कि वहाँ कैसे तीन से जाँच व ट्रैसिंग के ज़रिये काबू पाया गया।

इसके बाद भी तीनों क्षेत्रों में नये संक्रमणों के मामले में पाये गये। इनमें से अधिकांश विदेश से आये लोग थे, लेकिन कुछ में स्थानीय ट्रांसमिशन का भी पता चला है। इन तीन क्षेत्रों ने अब अस्थायी रूप से अंतर्राष्ट्रीय आगंतुकों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है और लौटने वाले निवासियों को दो सप्ताह क्वारंटाइन में समय बिता रहे हैं। टेटम का कहना है कि ज़रूरी उपायों को धीरे-धीरे और अति-सावधानी बरतनी होगी। साथ ही बेहद करीब से निगरानी किये जाने के साथ भरपूर आराम करने देना होगा।

अंत में…

कोरोना वायरस के बारे में एक बात यह है कि कोरोना वायरस वास्तव में कितना घातक है? यह बात विभिन्न वैज्ञानिकों के लिए चर्चा का विषय तो है ही, साथ ही यह गहरा रहस्य भी है। इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? और चीन के भले ही इस पर नियंत्रण पा लिया हो, पर बाकी दुनिया अब भी क्यों इससे जूझ रही है? इन सवालों के जवाब नहीं मिल पा रहे हैं। विश्व बैंक ने कहा है कि महामारी से होने वाले आॢथक नुकसान से पूर्वी एशिया की बड़ी आबादी को गरीबी में बदल सकता है। विश्व बैंक ने कहा है कि महामारी से वैश्विक अर्थ-व्यवस्था को अभूतपूर्व झटका लगने वाला है, जिससे विकास की गति थम सकती है। साथ ही कई इलाकों में गरीबी बढ़ सकती है। यह सब बातें बिल्कुल युद्ध जैसी स्थिति की ओर इशारा कर रही हैं। यह शायद चीन ही है, जिस पर सवाल उठाये जा रहे हैं। साथ ही कोरोना वायरस के फैलने को लेकर उसकी भूमिका पर रहस्य भी कायम है!

चरमरायेगी वैश्विक अर्थ-व्यवस्था

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप से यूरोप, अमेरिका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के दर्जनों केंद्रीय बैंकों द्वारा वैश्विक वित्तीय संकट की घोषणा की जा चुकी है। तमाम बड़े प्रोत्साहन पैकेज के ऐलान किये जाने के बावजूद वित्तीय बाज़ार की हालत खस्ता बनी रहने की आशंका बरकरार है। स्टॉक, बॉन्ड, सोने और कमोडिटी की कीमतों में गिरावट तो स्पष्ट थी, लेकिन प्रकोप ने उम्मीद से कहीं ज़्यादा गम्भीर आॢथक क्षति पहुँचायी है। पूर्वानुमान लगाया गया है कि 2020 की वैश्विक जीडीपी -2 फीसदी से 2.7 फीसदी के बीच रहेगी।

भारत भी वैश्विक मंदी से नहीं अछूता

हालाँकि भारत को एशियाई देशों में असर के बारे में ज़्यादा सुरक्षित माना जाता है। लेकिन वैश्विक मंदी का असर पडऩा तय है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के चलते कई क्षेत्रों पर विपरीत असर पडऩे वाला है। इन प्रमुख क्षेत्रों में विनिर्माण, तेल, वित्तीय व अन्य शामिल हैं। डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की अर्थ-व्यवस्था को लेकर नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, मंदी की स्थिति में आने वाले दिनों में कई कम्पनियों के दिवालिया होने की आशंका बढ़ गयी है। भारत पर भी वैश्विक मंदी का असर निश्चित तौर पर पडऩे वाला है। मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने 27 मार्च को कैलेंडर वर्ष 2020 में भारत की जीडीपी वृद्धि के लिए अपने पूर्वानुमान को 5.3 फीसदी से 2.5 फीसदी तक तेज़ कर दिया। यह आकलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश भर में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा के बाद 10 दिनों के अन्दर दूसरी बार जारी किया था।

ग्लोबल मैक्रो आउटलुक 2020-21 में मूडीज ने भारत के बैंकिंग और गैर-बैंकिंग क्षेत्रों में गम्भीर स्थिति आने वाली है, इससे विकास में बाधा हो सकती है। वैश्विक और घरेलू दोनों तरह की रेटिंग एजेंसियाँ इस बात पर एकमत हैं कि कोविड-19 महामारी भारत के लिए एक आॢथक सूनामी साबित होगी। भले ही देश यूरोजोन, अमेरिका या एशिया-प्रशांत के विपरीत मंदी के दौर की स्थिति में न पहुँचे; लेकिन चीन के साथ व्यापार सम्बन्ध मज़बूत होने के चलते भारत की जीडीपी वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। यही विश्लेषकों का मानना भी है। भारत में 21 दिनों के लॉकडाउन के साथ ही इसके आगे बढऩे की भी पूरे आसार हैं। ऐसे में कोरोना वायरस के खतरे के साथ ही आॢथक हालात भी और खराब होने के संकेत मिल रहे हैं। इस गिरावट का इतना ही असर अगले वित्त वर्ष 2021 पर भी पड़ेगा।

विदित हो कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लॉकडाउन के असर को कम करने के मकसद से 26 मार्च को 23 अरब रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसके बाद ब्याज दरों में कटौती का ऐलान किया, ताकि विपरीत परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सके। इसका मकसद यह है कि कारोबार के लिए कर्ज़ की उपलब्धता हो और गैर-परम्परागत उपायों की भरपाई की जा सके। भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि पहले से ही काफी कम है और आॢथक उत्पादन में किसी भी तरह का सेंध लगने का मतलब है कि उन श्रमिकों के लिए कहीं ज़्यादा पीड़ादायक साबित होने वाला होगा, जिन्होंने हाल के दिनों में अपनी कमाई में कमी देखी है।

जैविक जासूसी

मार्च, 2019 में रहस्यमयी तरीके से कनाडा के एनएलएल के अपवाद वाले वायरस जनित वायरसों का शिपमेंट का अन्त चीन में हो गया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनएमएल के वैज्ञानिकों ने कहा था कि उसमें जानलेवा वायरस थे; जो सम्भवत: जैविक हथियार थे। जाँच के बाद इस घटना का पता एनएमएल में जासूसी के लिए कुछ चीनी एजेंटों को लगा दिया गया। एनएमएल कनाडा की एकमात्र चार स्तर की सुविधा सुविधा वाली है और यह उत्तरी अमेरिका में से महज़ में कुछ एक में ही दुनिया की सबसे घातक बीमारियों से निपटने के तरीकों पर काम किया जाता है, जिनमें इबोला, सार्स, कोरोना वायरस आदि शामिल हैं।

एनएमएल के वैज्ञानिक, जिनको कनाडा की लैब से बाहर किया गया; उनमें से एक का पति भी था। साथ ही एक बायोलॉजिस्ट और शोध टीम के कुछ सदस्यों पर चाइनीज बायो वारफेयर एजेंट होने के आरोप लगे थे। ये एजेंट कनाडा के एनएमएल में शक्तिशाली वायरस का अध्ययन कर रहे थे। वैज्ञानिक दम्पति कथित तौर पर कई चीनी एजेंटों के साथ कनाडा के एनएमएल में घुसपैठ करने के लिए ज़िम्मेदार हैं। क्योंकि चीन की वैज्ञानिक सुविधाओं की एक सीमा के छात्रों को सीधे चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम में शामिल किया गया है, जिसमें वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और चीनी विज्ञान अकादमी, हुबेई शामिल हैं।

कनाडाई जाँच अब भी चल रही है और यह सवाल बना हुआ है कि क्या चीन के अन्य वायरसों या अन्य आवश्यक तैयारियों के लिए पिछला शिपमेंट 2006 से 2018 तक इसी तरह का था। कथित एजेंटों यानी वैज्ञानिकों ने चीनी विज्ञान अकादमी के वुहान राष्ट्रीय जैव सुरक्षा प्रयोगशाला के लिए 2017-18 में कम-से-कम पाँच यात्राएँ कीं। संयोग से वुहान नेशनल बायोसेफ्टी प्रयोगशाला, हुआनन सीफूड मार्केट से केवल 20 मील की दूरी पर स्थित है। कोरोना वायरस के प्रकोप का प्रमुख केंद्र हुबेई प्रान्त का वुहान ही है।

वुहान राष्ट्रीय जैव सुरक्षा प्रयोगशाला को चीन की सैन्य सुविधा के अंतर्गत है; जहाँ पर वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी का सम्बन्ध चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। वुहान संस्थान ने पहले भी कोरोना वायरस के साथ ही तनाव, सेवियर एक्यूट रेसपायरेटरी सिंड्रोम या सार्स, एच5एन1, इन्फ्लूएंजा वायरस, जापानी एन्सेफलाइटिस और डेंगू का अध्ययन किया गया है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने उस रोगाणु का भी अध्ययन किया, जो एंथ्रेक्स का कारण बनता है। यह एक जीवाणु है, जिसे रूस में विकसित किया गया था।

चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम को उन्नत चरण में माना जाता है, जिसमें अनुसंधान और विकास, उत्पादन और हथियार की क्षमताएँ शामिल हैं। माना जाता है कि इसकी वर्तमान सूची में पारम्परिक रासायनिक और जैविक एजेंटों की पूरी शृंखला को शामिल किया गया है। इसमें विभिन्न प्रकार के डिलीवरी सिस्टम जैसे तोपखाने रॉकेट, हवाई बम, स्प्रेयर और कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं। सैन्य-नागरिक संलयन की चीन की राष्ट्रीय रणनीति ने जीव विज्ञान को प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया है और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने इसका विस्तार करके आगे इसके दुरुपयोग का रास्ता खोला है।

पीएलए जीव विज्ञान के क्षेत्र में सैन्य अनुप्रयोग कर रहा है। इसके अलावा मस्तिष्क विज्ञान, सुपरकम्प्यूटिंग और आॢटफिशियल इंटेलीजेंस पर भी काम कर रहा है। 2016 से केंद्रीय सैन्य आयोग ने सैन्य मस्तिष्क विज्ञान, उन्नत बायोमिमेटिक सिस्टम, जैविक और बायोमिमेटिक सामग्री, व्यक्ति के प्रदर्शन को नया मार्ग दिखाने के आलवा जैव प्रौद्योगिकी के क्षेप में नयी अवधारणा पर काम किया है। रणनीतिक आनुवांशिक हथियारों और बिना खून बहा, जीत की सम्भावना के बारे में बात करने वाले रणनीतिकार युद्ध के उभरते हुए डोमेन के रूप में जीव विज्ञान को लेते हैं और इसमें चीनी सेना रुचि ले रही है। जब तक कनाडाई जाँच चीन में वायरस की चोरी और शिपमेंट के बारे में पूरी नहीं हो जाती, तब तक रहस्य और सवालों से पर्दा नहीं उठेगा कि कोरोना वायरस ने चीन में कैसे प्रवेश किया।

जाँच और निगरानी

चीन अब भी पूरे देश में कोविड-19 की निगरानी कर रहा है। प्रान्त के सभी निवासियों को एक क्यूआर कोड, जो एक तरह का बारकोड जारी किया है; जिसके ज़रिये स्कैन करके उनके स्वास्थ्य के विवरण और भ्रमण का इतिहास (ट्रैवल हिस्ट्री) की जानकारी का पता चल जाता है। यदि कोई व्यक्ति चीन में सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में या फिर इस बीमारी के लिए क्वारंटाइन पीरियड बिता चुका और जाँच में निगेटिव आया हो, तो उसे ग्रीन स्टेटस दिया जाता है। यानी वह व्यक्ति सबसे कम जोखिम की श्रेणी में आता है। इससे उनको प्रान्तीय सीमाओं को पार करने, अस्पतालों और आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति के साथ ही मेट्रो और ट्रेनों में सफर करने की अनुमति मिल जाती है।

इस तरह के उपाय न केवल संक्रमित लोगों को दूसरों के साथ घुलने-मिलने से रोकने में मददगार हैं, बल्कि यदि नया संक्रमण पाया जाता है, तो सरकार उस व्यक्ति की गतिविधियों को ट्रैक कर सकती है और उन लोगों को सूचित कर सकती है, जिनके वे सम्पर्क में आ चुके हों। काउलिंग ने इसे टेस्ट और ट्रैस (जाँच और निगरानी) का उन्नत रूप कहा है, जो चीन को यथासम्भव संक्रमित लोगों की पहचान करने और फिर उन्हें अलग करने में मददगार होगा। बड़ा सवाल यह है कि क्या इस तरह का नया प्रकोप रोकने के लिए ऐसा उपाय पर्याप्त होगा। काउलिंग का मानना है कि दूसरे शहरों में यह दिक्कत हो सकती है, अगर वहाँ पर वुहान जितने टेस्ट करने पड़े; जो कि यहाँ पर चरम पर मामले सामने आने के बाद रोज़ाना करीब 10,000 टेस्ट किये गये। परीक्षण और अलगाव पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करने में भी खतरा है। वे कहते हैं कि इस दौरान सामाजिक दूरी जैसे उपाय भी बेहद महत्त्वपूर्ण हैं।

चीन के शहरी लोगों में लोगों को अलग रखने के उपायों में ढील दिये जाने के भी अपने खतरे हैं। शंघाई में संग्रहालय और पर्यटन स्थल 18 दिन पहले ही खोल दिये थे, जिनको फिर से बन्द कर दिया गया है। सिनेमाघर भी फिर से बन्द कर दिये गये। हालाँकि, शहर ने कुछ नियमों में ढील दी है। लोगों को अब आवासीय परिसर छोडऩे के लिए पास की आवश्यकता नहीं है और लोग इन क्षेत्रों में प्रवेश करके सामान का वितरण कर सकते हैं। शहर ने कुछ सार्वजनिक क्षेत्रों में मास्क पहनने की आवश्यकता को भी खत्म कर दिया है। इसके लिए पुलिस ने पहले ड्रोन या रोबोट पर अपनाकर देखा, फिर इसे अपनाया गया।

इटली, स्पेन और अमेरिका समेत अधिकांश यूरोपीय देशों में अब वायरस का प्रकोप चरम पर पहुँच रहा है, जिससे वे बुरी तरह प्रभावित हैं। वे सामाजिक दूरी जैसे उपायों पर भरोसा कर रहे हैं और लोगों को घर पर रहने के लिए ही कहा जा रहा है। चीन ने उन उपायों को तो अपनाया ही साथ ही नये अस्पतालों का भी निर्माण भी किया और बड़े पैमाने पर टेस्ट किये। इसके बाद स्वास्थ्यकॢमयों ने घर-घर जाकर लोगों के तापमान की जाँच की। उन्होंने, जिनमें टेस्ट के दौरान बुखार पाया; उनका टेस्ट करवाया। साथ ही उन्हें बाकी लोगों से अलग कर दिया। काउलिंग कहते हैं कि इस तरह अतिरिक्त कदम उठाकर चीन को वायरस फैलने से रोकने में मदद मिली। अब पूरी दुनिया इसका अनुसरण कर रही है। लेकिन ठीक उसी तरह नहीं, जैसा कि चीन ने किया है।

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